सिंधिया वंश (मध्य प्रदेश)
सिंधिया वंश का संस्थापक राणोजी शिंदे था. जो कान्हेरखेड़ा के पाटिल परिवार से सम्बंधित था। 1729 ई. में अमझेरा के युद्ध में राणोजी ने वीरता का प्रदर्शन किया था तथा पुणे दरबार से राणोजी को होल्कर वंश के समान भागीदारी दी गई, जिसमें उन्हें उज्जैन, शाजापुर और शुजावलपुर (शुजालपुर) आदि क्षेत्र प्राप्त हुए।
1732 ई. मालवांचल के विभाजन सम्बंधी दस्तावेज के अनुसार राणोजी के नियंत्रण में शुजालपुर तथा सुंदरसी था। 1753 ई. में सिंधिया ने अपने अधिकार क्षेत्र में ढोबरी, बोराड़ तथा हाटोली को मिला लिया। 1766 ई. में उत्तर भारत की आय के बँटवारे से पेशवा सरकार को 46 प्रतिशत तथा होल्कर एवं सिंधिया को 21 प्रतिशत भाग प्राप्त होता था।
वर्ष 1745 में राणोजी की मृत्यु के पश्चात् सिंधिया वंश का सबसे प्रतापी राजा महादजी सिंधिया सत्तासीन हुआ, जिसने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध में भाग लिया। इन्होंने 1765 ई. में गोहद के जाट लोकेन्द्र सिंह से ग्वालियर का किला छीन लिया था।
- महादजी सिंधिया ने दिल्ली पर अधिकार करके मुगल सम्राट शाह आलम को गुलाम कादिर के नियंत्रण से मुक्त कराया, जिसके बदले में मुगल सम्राट ने महादजी को अपना प्रधानमंत्री बनाकर सभी प्रशासनिक अधिकार दे दिये। 1810 ई. तक सिंधिया की राजधानी उज्जैन थी, किंतु इसके पश्चात् दौलतराव सिंधिया ने ग्वालियर को अपनी राजधानी बनाया।
- सिंधिया वंश के अन्य उत्तराधिकारी जानकोजीराव-॥ (1827 1843 ई.), जयाजीराव (1843-1886 ई.), माधोराव (1886-1925 ई.) एवं जीवाजी राव थे।
5 जून, 1925 को माधोराव सिंधिया की मृत्यु हो गई जिसके पश्चात् उनके अल्पवयस्क (9 वर्षीय) पुत्र जीवाजी राव सिंधिया को ग्वालियर रियासत का उत्तराधिकारी बनाया गया। जीवाजी राव के वयस्क होने तक रियासत का प्रशासन चलाने के लिए महारानी की अध्यक्षता में काउंसिल ऑफ एजेंसी का गठन किया गया था।
महाराजा जीवाजी राव सिंधिया का विवाह राजमाता विजयाराजे से हुआ था। विजयाराजे का जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले में हुआ था।
सुप्रसिद्ध हिन्दी लेखिका मृदुला सिन्हा ने एक रानी ऐसी भी के नाम से राजमाता विजयाराजे की जीवनी लिखी है।
नवम्बर, 1936 को जीवाजी राव को महाराजा के पूरे अधिकार सौंप दिए गए। अप्रैल 1948 में दिल्ली में मध्य भारत के राजाओं के सम्मेलन में 25 रियासतों का संयुक्त संघ बनाया गया, जिसे मध्य भारत का नाम प्रदान किया गया।
मई, 1948 को पं. जवाहरलाल नेहरू ने मध्य भारत राज्य के प्रथम राज प्रमुख के रूप में जीवाजी राव सिंधिया को शपथ दिलाई।
ग्वालियर की संधि, 1817 ई.
पिंडारियों के विरुद्ध अपनी तैयारी के दौरान गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स एवं ग्वालियर रियासत के शासक दौलतराव सिंधिया के मध्य 5 नवंबर, 1817 को ग्वालियर की संधि हुई थी।
मंदसौर की संधि, 1818 ई.
यह संधि इंदौर के मल्हार राव होलकर और अंग्रेजों के मध्य वर्ष 1818 को हस्ताक्षरित हुई थी। इसमें होलकर को सतपुड़ा पहाड़ियों के दक्षिणी क्षेत्र अंग्रेजों को देना पड़ा। वेलेजली के दौरान वर्ष 1805 में राजपुरघाट की संधि हुई थी, जिसमें यशवंत राव होलकर को चम्बल का उत्तरी भाग एवं बुंदेलखंड छोड़ना पड़ा।
2. मध्य प्रदेश का इतिहास
- पुरापाषाण काल
- मध्यपाषाण काल
- नवपाषाण काल
- ताम्रपाषाण काल
- मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति
- ऐतिहासिक काल (लौह युग)
- वैदिक सभ्यता
- पौराणिक कालखण्ड
- महाजनपद काल
- मौर्य काल
- शुंग वंश
- सातवाहन वंश
- हिन्द-यवन
- शक वंश
- कुषाण वंश
- नागवंश
- आभीर वंश
- बोधि और मघ
- वाकाटक वंश
- गुप्त वंश
- औलिकर वंश
- परिव्राजक और उच्चकल्प
- पाण्डु वंश
- परवर्ती गुप्त एवं मौखरि वंश
- कलचुरि राजवंश
- चंदेल
- राष्ट्रकूट
- गुर्जर-प्रतिहार वंश
- मालवा का परमार वंश
- दिल्ली सल्तनत
- मालवा में स्वतंत्र मुस्लिम सल्तनत की स्थापना
- निमाड़ में फारूकी शासन
- मुगल काल
- गढ़ा का गोंड वंश
- तोमर वंश
- बुंदेला वंश
- बघेलखण्ड राज्य
- मध्य प्रदेश में आधुनिक काल का इतिहास
- होल्कर रियासत
- सिंधिया वंश
- भोपाल रियासत
- भोपाल की बेगमें
- मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रमुख विद्रोह
- मध्य प्रदेश में 1857 की क्रांति
- राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में मध्य प्रदेश की भूमिका
- झण्डा सत्याग्रह
- जंगल सत्याग्रह
- मध्य प्रदेश में नमक सत्याग्रह
- चरणपादुका नरसंहार
- पंजाब मेल हत्याकांड
- सोहाबल का नरसंहार
- स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अन्य गतिविधियाँ
- भोपाल राज्य का स्वतंत्रता संघर्ष
- भोपाल का जलियाँवाला काण्ड
- रीवा का चावल आंदोलन
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