राष्ट्रकूट वंश (मध्य प्रदेश)

राष्ट्रकूट वंश (मध्य प्रदेश)

राष्ट्रकूट मूलतः कलचुरि शासकों के सामंत थे, परन्तु बाद में ये बादामी के चालुक्यों के प्रति समर्पित हो गए। बैतूल जिले के तिवारखेड़ प्रशस्ति से चार राष्ट्रकूट नरेशों (दुर्गराज, गोविन्दराज, स्वामिकराज और नन्नराज) के नाम ज्ञात होते हैं। नन्नराज के दो ताम्रपत्र अभिलेख तितरखेड़ी तथा मुल्ताई, बैतूल जिले से प्राप्त हुए है। इन राजाओं ने बैतूल क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित किया था।
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यह प्रशस्ति अचलपुर (इलिचपुर) से 553 ई. से 631 ई. में जारी की गई थी। इसमें तिवारखेड़ और घुईखेट ग्रामों की भूमि का दान किया गया था। द्वितीय प्रशस्ति 709-710 ई. की है, इसमें नन्नराज के लिए युद्धशूर नाम का प्रयोग किया गया है।
  • इन प्रशस्तियों की मुहर में गरुड़ की आकृति अंकित है। बादामी के चालुक्य वंशीय पुलकेशिन द्वितीय (611-642 ई.) ने दुर्गराज को चालुक्य राज्य का प्रधान राष्ट्रकूट (राज्यपाल) नियुक्त किया था।
  • नन्नराज ने (690-735 ई.) वंश के चिह्न के रूप में गरुड़ का चयन किया था। लगभग इसी समय दक्षिण में मान्यखेत के राष्ट्रकूटों का गौरवपूर्ण काल दंतिदुर्ग (733-758 ई.) की अधीनता में आरंभ हुआ। दंतिदुर्ग 733 ई. में सिंहासन पर बैठा तथा चालुक्य शासक को अपना उत्तराधिकारी बनाया। दन्तिदुर्ग ने आठवीं शताब्दी के मध्य मालवा तथा पूर्वी मध्य प्रदेश पर अधिकार कर लिया।
  • दन्तिदुर्ग के पश्चात् कृष्ण प्रथम (758-773 ई.) गद्दी पर बैठा। प्राचीन मध्य प्रदेश का मराठी भाग उसके अधिकार में आ गया था। कृष्ण प्रथम के पश्चात् गोविन्द द्वितीय (773-780 ई.) गद्दी पर बैठा।
  • गोविन्द द्वितीय के बाद ध्रुव (780-793 ई.) गद्दी पर बैठा। उसने उज्जैन के प्रतिहार शासक वत्सराज को झाँसी के निकट परास्त किया था। ध्रुव के पश्चात् उसका पुत्र गोविन्द तृतीय ( 793-814 ई.) सत्तासीन हुआ। मध्य प्रदेश में उसके अनेक दान-पत्र प्राप्त हुए हैं। भोपाल और झाँसी के मध्य बुंदेलखण्ड में उसका संघर्ष प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय से हुआ था।
इसके पश्चात् अमोघवर्ष या शर्व (814-878 ई.) नामक विद्वान गद्दी पर बैठा। अमोघवर्ष ने मान्यखेत नगर बसाया। उसने स्वयं कविराज मार्ग नामक ग्रंथ लिखा। जबलपुर जिले में कारी तलाई से कलचुरि संवत् (842-43 ई.) का खंडित शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें अमोघवर्ष का उल्लेख है।
  • अमोघवर्ष के उपरांत उसका पुत्र कृष्ण द्वितीय राजा बना। उसने त्रिपुरी के कलचुरि राजा कोक्कल देव की पुत्री से विवाह किया था। कृष्ण द्वितीय का संघर्ष कन्नौज के प्रतिहार राजा मिहिरभोज से हुआ। इसके पश्चात् गोविन्द चतुर्थ राजा बना, जिसे उसके चाचा अमोघवर्ष तृतीय (936-939 ई.) ने गद्दी से हटा दिया था। अमोघवर्ष तृतीय का विवाह त्रिपुरी के कलचुरि नरेश युवराज की पुत्री कुन्दकादेवी से हुआ था। कृष्ण तृतीय (939-968 ई.) ने संभवत: डाहाल प्रदेश पर आक्रमण कर कलचुरि नरेश लक्ष्मणराज तृतीय (945-970 ई.) को पराजित किया था।
  • मध्य प्रदेश के इन अभियानों में राष्ट्रकूट कृष्ण तृतीय और कलचुरि राजाओं के मध्य विवाद के पश्चात् दोनों वंशों के मैत्रीपूर्ण सम्बंध समाप्त हो गए। अमोघवर्ष तृतीय के पश्चात् कृष्ण तृतीय (939-968 ई०) सत्तासीन हुआ उसने अनेक युद्ध अभियान किए तथा कलचुरि शासक लक्ष्मणराज तृतीय को पराजित किया। कृष्ण तृतीय के पश्चात् उसका छोटा भाई खोत्तिग (968-972 ई.) गद्दी पर बैठा, परन्तु इसके शासन काल में राष्ट्रकूटों की सत्ता का आकर्षण प्रारम्भ हो गया। मालवा के परमार राजा सियक (949-972 ई) ने 971 ई. में राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत पर आक्रमण करके उसे लूट लिया था।
खोत्तिग के पश्चात् उसका भतीजा कर्क द्वितीय (972-973 ई.) राजा बना। उसकी अयोग्यता का लाभ उठाकर उसके चालुक्य सामंत तैलप द्वितीय ने उसे परास्त कर राष्ट्रकूटों के साम्राज्य पर अधिकार कर लिया।
इस प्रकार राष्ट्रकूटों के लगभग 225 वर्षीय गौरवशाली शासन का अंत हो गया।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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