पौराणिक कालखण्ड : मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव

पौराणिक कालखण्ड (मध्य प्रदेश)

यह लेख मध्य प्रदेश के पौराणिक कालखण्ड की ऐतिहासिक गाथाओं और समृद्ध विरासत को उजागर करता है। इसमें करकोट नागवंश, हैहय वंश, महिष्मती नगर, रामायण और महाभारत काल से जुड़े विभिन्न जनपदों और शासकों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
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लेख में ऐतिहासिक नगरों, शक्तिशाली राजवंशों और सांस्कृतिक परंपराओं को रोचक तथ्यों और प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठकों को मध्य प्रदेश के प्राचीन गौरवशाली अतीत की गहरी जानकारी प्राप्त होती है।

करकोट नागवंश और नर्मदा की उत्पत्ति

पौराणिक कथाओं के अनुसार, करकोट नागवंशी शासक नर्मदा नदी के किनारे स्थित काठे प्रदेश के शासक थे। इनकी पुत्री नर्मदा का विवाह इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा पुरुकुत्स के साथ संपन्न हुआ था। कहा जाता है कि पुरुकुत्स ने ही रेवा नदी का नाम परिवर्तित कर ‘नर्मदा’ कर दिया था। इस तथ्य से नर्मदा नदी के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का पता चलता है।

मान्धाता नगरी की स्थापना और महिष्मती का उदय

करकोट नागवंश के बाद, मुचकुंद नामक शासक ने विंध्य तथा सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के मध्य ‘मान्धाता नगरी’ (वर्तमान खंडवा) की स्थापना की। बाद में, यदुवंश की हैहय शाखा के प्रतापी राजा महिष्मत ने इस नगर पर अधिकार कर इसे ‘महिष्मती’ नाम दिया। यह नगर अपने समय में एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा।

हैहय वंश और सहस्त्रार्जुन का प्रभुत्व

हैहय वंश के सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक कीर्तवीर्य अर्जुन थे, जिन्हें ‘सहस्त्रार्जुन’ के नाम से भी जाना जाता है। वे एक महाप्रतापी योद्धा थे और उन्होंने कारकोट नागवंश के साथ हुए युद्ध में अनूपदेश (निमाड़) को पराजित किया था। उनके उत्तराधिकारियों में जयध्वज, तालजंध और वीतिहोत्र प्रमुख थे।

प्राचीन जनपदों का विस्तार

उस काल में तुण्डीकेर (वर्तमान दमोह), त्रिपुरी (तेवर), दशार्ण (विदिशा), अनूप (निमाड़) और अवंति (उज्जैन) जैसे कई महत्वपूर्ण जनपद विद्यमान थे। ये सभी जनपद उस समय के राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र थे, जो आगे चलकर विभिन्न राजवंशों के शासनकाल में विकसित हुए।

रामायण काल और दशार्ण जनपद

रामायण काल में मध्य प्रदेश का अधिकांश क्षेत्र महाकान्तर और दण्डकारण्य के अंतर्गत आता था। कालिदास के महाकाव्य ‘रघुवंशम्’ के अनुसार, भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने दक्षिण कौशल में शासन किया था, जबकि उनके अनुज शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाती (सुबाहु) ने दशार्ण (विदिशा) पर राज्य किया था। इससे विदिशा क्षेत्र के प्राचीनकाल से ही एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र होने का प्रमाण मिलता है।

वैवस्वत मनु और बघेलखंड का ऐतिहासिक महत्व
महाभारत, रामायण और विभिन्न पुराणों के अनुसार, अंतिम वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में करुष नामक पुत्र ने करुष (कुरुष) देश की स्थापना की थी, जिसे वर्तमान में बघेलखंड के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है और कई प्रमुख राजवंशों का केंद्र भी रहा है।

यदुवंश और चर्मावती क्षेत्र
ययाति के पुत्र यदु द्वारा स्थापित यादव वंश का प्रभाव चर्मावती (चंबल), वेत्रवती (बेतवा) और शुक्तिमती (केन) नदी तक विस्तृत था। यह क्षेत्र प्राचीन भारत के समृद्ध नगरों और शक्तिशाली शासकों का केंद्र था। यादवों ने इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित कर कई महत्वपूर्ण नगरों की नींव रखी।

महाभारत काल और बुंदेलखंड का संबंध

बुंदेलखंड का संबंध भी महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। महाभारत में वर्णित कुख्यात दैत्य ‘दंतवक्र’ के नाम पर वर्तमान दतिया जिले का नामकरण किया गया था। यह वही दंतवक्र था जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने पराजित किया था। उनके पराजय के पश्चात उन्हें ‘गोपालकक्ष’ कहा गया और इसी आधार पर ग्वालियर की पहाड़ियों को ‘गोपालगिरि’ कहा जाने लगा।
मध्य प्रदेश का पौराणिक कालखण्ड अत्यंत समृद्ध, गौरवशाली और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। करकोट नागवंश से लेकर हैहय वंश, यादव वंश और रामायण-महाभारत के विभिन्न प्रसंगों तक, यह क्षेत्र प्राचीन भारत के शक्ति, संस्कृति और परंपरा का अद्भुत संगम रहा है। इसके ऐतिहासिक नगर, प्राचीन जनपद और महापुरुषों की गाथाएं इस भूमि को एक अनोखी ऐतिहासिक पहचान प्रदान करती हैं।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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