परवर्ती गुप्त एवं मौखरि वंश (मध्य प्रदेश)

परवर्ती गुप्त एवं मौखरि वंश (मध्य प्रदेश)

इस लेख में मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में परवर्ती गुप्त एवं मौखरि वंश की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। इसमें परवर्ती गुप्त शासकों की स्वतंत्रता, उनके प्रमुख शासकों, मालवा पर उनके प्रभाव, तथा मौखरि वंश के कन्नौज और मध्य प्रदेश में विस्तार की चर्चा की गई है। साथ ही, इन वंशों के पतन के कारणों को भी स्पष्ट किया गया है। यह लेख इतिहास प्रेमियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए उपयोगी है।
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परवर्ती गुप्त वंश गुप्त सम्राटों के अधीन सामंत के रूप में स्थापित हुआ था, लेकिन 5वीं शताब्दी के मध्य इन्होंने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। अवसाद अभिलेख में इस वंश के कई शासकों का उल्लेख मिलता है, जिनमें प्रमुख रूप से कृष्ण गुप्त, हर्ष गुप्त, जीवित गुप्त, कुमार गुप्त, दामोदार गुप्त, महासेन गुप्त और आदित्य सेन गुप्त शामिल हैं।
बाणभट्ट द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ हर्षचरित में परवर्ती गुप्त वंश के महासेन गुप्त को मालवा का नरेश बताया गया है। हालांकि, उनका शासन अधिक समय तक नहीं चला, और शीघ्र ही वल्लभी के मैत्रक वंशीय शासक शिलादित्य प्रथम (लगभग 600 ई.) ने पश्चिमी मालवा के बड़े भाग पर अधिकार स्थापित कर लिया।

मौखरि वंश और मध्य प्रदेश पर प्रभाव

गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात् छठी शताब्दी के मध्य उत्तर प्रदेश के कान्यकुब्ज (कन्नौज) नगर में मौखरि वंश की सत्ता स्थापित हुई। मध्य प्रदेश के पूर्व निमाड़ जिले में स्थित असीरगढ़ के किले से महाराजाधिराज सर्ववर्मन का ताम्र-मुहर लेख प्राप्त हुआ है, जो इस क्षेत्र में मौखरि वंश के प्रभाव को दर्शाता है।
बुन्देलखण्ड स्थित कालिंजर क्षेत्र पर मौखरियों का प्रभाव भोजदेव के विक्रम संवत् 893 के दानपत्र से प्रमाणित होता है, जिसमें राजा सर्ववर्मन द्वारा दिए गए दान का उल्लेख किया गया है। हालांकि, कालांतर में कलचुरि और चालुक्य शासकों के आक्रमणों ने मौखरि वंश की शक्ति को कमजोर कर दिया। अंततः यह वंश परवर्ती गुप्त सम्राटों और थानेश्वर के वर्द्धन सम्राटों के सामंत के रूप में सीमित रह गया।
परवर्ती गुप्त और मौखरि वंशों का मध्य प्रदेश के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जहाँ एक ओर परवर्ती गुप्त शासकों ने मालवा और अन्य क्षेत्रों में शासन किया, वहीं दूसरी ओर मौखरि वंश ने बुन्देलखण्ड और निमाड़ क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इन वंशों का प्रभाव धीरे-धीरे अन्य शक्तिशाली राजवंशों के बढ़ते प्रभुत्व के कारण कम होता गया, लेकिन इनका ऐतिहासिक महत्व आज भी बना हुआ है।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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