परिव्राजक और उच्चकल्प वंश
इस लेख में मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक परिव्राजक और उच्चकल्प वंशों की विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें परिव्राजक वंश के उद्भव, उनके प्रमुख शासकों जैसे महाराज हस्ती और संक्षोभ के शासनकाल, उनकी राजधानी और प्रशासनिक व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। साथ ही, उच्चकल्प वंश के प्रमुख शासकों, उनकी राजधानी उच्चकल्प (उचेहरा, सतना), तथा भूमरा शिलालेख से प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों को भी शामिल किया गया है।
यह लेख इन दोनों वंशों के राजनीतिक और प्रशासनिक योगदान को स्पष्ट करता है। ये दोनों राजवंश बुंदेलखंड क्षेत्र में अपने प्रभाव और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध थे।
परिव्राजक वंश
बुंदेलखंड के खोह ग्राम में प्राप्त 482-483 ईस्वी के ताम्रपत्रों में परिव्राजक महाराजाओं का उल्लेख मिलता है। इन शासकों को परिव्राजक महाराजा कहा जाता था, क्योंकि वे शाही परिव्राजक राजर्षि सुशर्मन के वंशज थे। इनकी राजधानी नागौद रियासत में स्थित थी।
खोह ताम्रपत्र में महाराज हस्ती का उल्लेख किया गया है, जिन्हें ‘गुप्तनृपराजभुक्तौ’ लिखा गया है, जिससे प्रतीत होता है कि वे बुधपुत्र के सामंत थे। बैतूल में मिले एक अन्य लेख में इस वंश की वंशावली दी गई है।
परिव्राजक वंश के प्रमुख शासक:
- महाराज हस्ती (475-517 ईस्वी)
- संक्षोभ (518-528 ईस्वी) - इनके शासनकाल में डाभाल (वर्तमान जबलपुर) और उसके आसपास के 18 गढ़ शामिल थे। इनके शासन से संबंधित छह ताम्रपत्र भी प्राप्त हुए हैं।
उच्चकल्प वंश
परिव्राजक राज्य के निकट ही उच्चकल्प वंश का शासन था, जिसकी राजधानी उच्चकल्प (उचेहरा, सतना) में स्थित थी। उचेहरा से लगभग 14 किमी दूर भूमरा में स्थित एक शिला स्तंभ, इन दोनों राज्यों की सीमाओं को इंगित करता है।
उच्चकल्प वंश के प्रमुख शासकों में निम्नलिखित नरेशों का उल्लेख ताम्रपत्रों में मिलता है:
- ओद्यदेव
- कुमारदेव
- जयनाथ
- सर्वनाथ
भूमरा शिलालेख के अनुसार, सर्वनाथ समकालीन परिव्राजक शासक महाराज हस्ती के समकालीन थे। उच्चकल्प शासक जयनाथ के अभिलेखों से उनके पूर्व शासक ओघदेव, कुमारदेव, जयस्वामिन और व्याघ्रराज का भी पता चलता है।
परिव्राजक और उच्चकल्प वंशों का मध्य प्रदेश के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। इनके शासनकाल में प्रशासनिक संरचना, सीमाओं की स्थापना और राजनीतिक प्रभुत्व स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। विशेष रूप से, नागौद और उचेहरा जैसे स्थान, ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गए, जो मध्यकालीन भारत के राजनीतिक परिदृश्य को समझने में सहायक हैं।
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