मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति : इतिहास, विशेषताएँ और महत्व

मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति

मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र प्राचीन सभ्यताओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ की ताम्रपाषाण संस्कृति भारतीय इतिहास के प्रारंभिक कृषि और बसावट के दौर को दर्शाती है। इस संस्कृति का प्रमुख केंद्र नवदाटोली और महेश्वर रहा है, जहाँ के उत्खननों ने प्राचीन मानव सभ्यता की कई रहस्यमयी परतें खोली हैं।
malwa-ki-tamra-pashan-sanskriti
इस लेख में हम मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति की खोज, इसकी प्रमुख विशेषताओं, आर्थिक व्यवस्था और ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति की खोज और प्रमुख स्थल

मध्य प्रदेश में ताम्रपाषाण संस्कृति का सबसे पहला प्रमाण नवदाटोली और महेश्वर के उत्खनन से प्राप्त हुआ। इसे मालवा (नवदाटोली) ताम्रपाषाण संस्कृति कहा जाता है।
  • नवदाटोली: यह स्थल नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर स्थित है।
  • महेश्वर: यह नर्मदा घाटी के दक्षिणी तट पर स्थित है।
  • अन्य प्रमुख स्थल: नागदा, एरण, कायथा, मनोती और इनामगाँव।
इन स्थलों की खोज और अध्ययन का श्रेय प्रसिद्ध पुरातत्वविद् एच. डी. सांकलिया को जाता है। वहीं, कायथा स्थल की खोज वर्ष 1964 में वी. एस. वाकणकर ने की थी।

मृद्भाण्ड परंपरा और जीवनशैली

मालवा ताम्रपाषाण संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता मृद्भाण्ड परंपरा है।
  • यहाँ के स्थलों से भूरे रंग के मिट्टी के बर्तन (मृद्भाण्ड) मिले हैं।
  • इन बर्तनों पर काले और गुलाबी रंगों से ऊपरी आरेख एवं चिपकावा विधि द्वारा अलंकरण किया गया है।
  • इस विशिष्ट शैली को मालवा मृद्भाण्ड परंपरा कहा जाता है।
इसके अलावा, यहाँ के निवासी मिट्टी और बाँस से बने घरों में रहते थे, जो इस क्षेत्र की स्थानीय निर्माण शैली को दर्शाता है।

आर्थिक ढाँचा और जीवनयापन

  • इस संस्कृति का आर्थिक ढाँचा ग्राम प्रधान था, यानी यह एक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था थी।
  • यहाँ के लोग कृषि और पशुपालन को मुख्य रूप से अपनाते थे।
  • उनके द्वारा गेहूँ, जौ, ज्वार, बाजरा आदि की खेती की जाती थी।
  • इसके अलावा, यह समाज मृद्भाण्ड निर्माण, बर्तन बनाने और शिकार जैसे कार्यों में भी संलग्न था।

काल निर्धारण (Chronology) और ऐतिहासिक महत्व

  • प्रसिद्ध पुरातत्वविद् एच. डी. सांकलिया के अनुसार, यह संस्कृति 1000-500 ईसा पूर्व के बीच अस्तित्व में थी।
  • परंतु रेडियो कार्बन-14 परीक्षण से इसकी तिथि 1700-1200 ईसा पूर्व मानी जाती है।
  • इस काल में ताम्र और पत्थर (Copper & Stone) के मिश्रित उपयोग के कारण इसे ताम्रपाषाण युग कहा जाता है।
  • यह संस्कृति भारत में कृषि, समाज और कला के प्रारंभिक विकास को दर्शाती है।
मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति भारत के प्राचीन इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। नवदाटोली और महेश्वर जैसे स्थलों ने इस संस्कृति की जीवनशैली, कला और अर्थव्यवस्था को उजागर किया है। यह संस्कृति न केवल मध्य प्रदेश के इतिहास का हिस्सा है, बल्कि भारतीय पुरातत्व और प्राचीन सभ्यता के अध्ययन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी अनूठी मृद्भाण्ड परंपरा, कृषि व्यवस्था और ग्राम प्रधान जीवनशैली भारतीय इतिहास के प्रारंभिक समाज की झलक प्रस्तुत करती है।
यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र प्राचीन काल से ही एक उन्नत और संपन्न सभ्यता का केंद्र रहा है, जहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

Post a Comment

Post a Comment (0)

Previous Post Next Post