मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रमुख विद्रोह
मध्य प्रदेश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कई महत्वपूर्ण विद्रोह हुए, जिनमें स्थानीय शासकों, जमींदारों और जनजातीय समूहों ने अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया।
ये विद्रोह मुख्य रूप से ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों, क्षेत्रीय हस्तक्षेप और शासकों के प्रति अन्याय के कारण हुए।
1818 ई. का विद्रोह - महाकौशल क्षेत्र
मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम विद्रोह 1818 ई. में महाकौशल क्षेत्र में हुआ। इस विद्रोह का मुख्य कारण अंग्रेजों द्वारा नागपुर के शासक अप्पाजी भोंसले को मण्डला, बैतूल, सिवनी, छिंदवाड़ा और नर्मदा कछार का क्षेत्र छोड़ने के लिए बाध्य करना था। अप्पाजी भोंसले ने अरब सैनिकों के सहयोग से मुलताई (बैतूल) में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, लेकिन अंततः उनकी पराजय हुई।
1833 ई. का विद्रोह - रायगढ़ नरेश जुझार सिंह के पुत्र देवनाथ सिंह
1833 ई. में रायगढ़ नरेश जुझार सिंह के पुत्र देवनाथ सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया। यह विद्रोह स्थानीय असंतोष और ब्रिटिश शासन की विस्तारवादी नीति के खिलाफ एक बड़ा कदम था।
1842 ई. का विद्रोह - दुरभि संधि से असंतोष
1842 ई. में हुई दुरभि संधि से असंतुष्ट होकर मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में व्यापक विद्रोह हुआ। यह विद्रोह मुख्य रूप से सागर, दमोह, नरसिंहपुर, जबलपुर, मण्डला और होशंगाबाद में देखा गया। इस विद्रोह में विभिन्न स्थानीय शासकों और जमींदारों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
विद्रोह के प्रमुख नायक:
- भरहुत (सतना) के मधुकरशाह
- चन्द्रपुर (सागर) के जमींदार जवारहट सिंह बुन्देला
- मदनपुर (नरसिंहपुर) के गोंड जमींदार डेलन शाह
- हीरापुर के किरेन शाह
मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध हुए ये विद्रोह ब्रिटिश सत्ता के प्रति स्थानीय असंतोष को दर्शाते हैं। यद्यपि इनमें से कई विद्रोह असफल रहे, लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाद में, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी मध्य प्रदेश के क्रांतिकारियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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