मध्य प्रदेश में 1857 की क्रांति
1857 की क्रांति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम संगठित विद्रोह था, जिसमें मध्य प्रदेश का महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह विद्रोह 3 जून, 1857 को नीमच छावनी से प्रारंभ हुआ, जहाँ पैदल और घुड़सवार सैनिकों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह छेड़ा।
हालांकि, कर्नल सी.बी. सोबर्स ने उदयपुर के राजपूत सैनिकों की सहायता से इस विद्रोह को दबाने में सफलता प्राप्त की और नीमच के किले एवं निम्बाहेड़ा पर पुनः अधिकार कर लिया।
1857 की क्रांति के प्रमुख केंद्र और नेतृत्व
1. सागर में विद्रोह
शेख रजमान के नेतृत्व में अश्वारोही सैन्य टुकड़ी ने सागर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया।
2. गढ़ा मंडला (जबलपुर) में संघर्ष
शंकरशाह और उनके पुत्र ने जबलपुर स्थित गढ़ा मंडला में क्रांति का नेतृत्व किया। ब्रिटिश सेना ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए कठोर दमन नीति अपनाई।
3. मंडला और रायपुर में क्रांति
मंडला में श्री बहादुर और देवी सिंह ने विद्रोह का नेतृत्व किया, वहीं रायपुर में जमींदार नारायण सिंह ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ मोर्चा संभाला।
4. बुंदेलखंड और शिवपुरी में विद्रोह
20 जून, 1857 को शिवपुरी में विद्रोह प्रारंभ हुआ, जिसके बाद बुंदेलखंड के स्थानीय सैनिकों ने भी इस आंदोलन में भाग लिया। भोपाल की सिकंदर जहाँ बेगम ने अंग्रेजों का समर्थन किया और ब्रिटिश अधिकारियों को शरण दी।
5. महू में सआदत खाँ के नेतृत्व में विद्रोह
1 जुलाई, 1857 को महू में सआदत खाँ के नेतृत्व में विद्रोह हुआ, किंतु ब्रिगेडियर स्टुअर्ट ने इसे दबा दिया।
6. झाँसी और ग्वालियर में संघर्ष
4 अप्रैल, 1858 को सर ह्यूरोज ने झाँसी पर आक्रमण किया, जिसमें रानी लक्ष्मीबाई ने वीरता से युद्ध किया। तात्या टोपे के सहयोग से रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया, लेकिन 17 जून, 1858 को कोटा की सराय में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं।
तात्या टोपे: छापामार युद्ध के महानायक
1857 के विद्रोह के प्रमुख योद्धा तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग) ने अपनी छापामार युद्धनीति से अंग्रेजों को गहरे आघात दिए। उन्हें "महाराष्ट्र का बाघ" भी कहा जाता है। लेकिन, सिंधिया के सामंत मानसिंह के विश्वासघात के कारण वे अंग्रेजों द्वारा बंदी बना लिए गए और 18 अप्रैल, 1859 को शिवपुरी में फाँसी दे दी गई।
मंडलेश्वर में विद्रोह और दमन
मंडलेश्वर में बंगाल रेजीमेंट के विद्रोही सैनिकों ने कैप्टन बेंजामिन हेब्स की हत्या कर दी और दो वर्षों तक शासन किया। लेकिन 1859 में ब्रिटिश सेना ने पुनः इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और विद्रोही सैनिकों को सामूहिक रूप से फाँसी दे दी गई।
रानी अवंतीबाई लोधी: वीरांगना का बलिदान
रामगढ़ रियासत के जमींदार की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने वहाँ अपने तहसीलदार को नियुक्त किया, जिसका रानी अवंतीबाई ने विरोध किया। उन्होंने खेती गाँव में ब्रिटिश सेनापति वार्डन से युद्ध कर उसे पराजित किया।
दिसंबर 1857 में अंग्रेज सेनापति वार्डन ने रीवा राज्य की सेना की सहायता से पुनः गढ़मंडला पर आक्रमण किया। 20 मार्च, 1858 को जब पराजय निश्चित हो गई, तो रानी अवंतीबाई ने अपनी अंगरक्षिका गिरधारीबाई के साथ आत्महत्या कर ली।
मध्य प्रदेश: 1857 की क्रांति के प्रमुख नेतृत्वकर्ता
नेतृत्वकर्ता | संबंधित स्थल |
---|---|
तात्या टोपे | कानपुर-झांसी-ग्वालियर |
रानी लक्ष्मीबाई | झांसी-कालपी |
टांट्या भील | खरगोन |
शेख रमजान | सागर |
झलकारी बाई (लक्ष्मीबाई की अंगरक्षक) | झांसी |
राजा ठाकुर प्रसाद | राघवगढ़ |
नारायण सिंह | रायपुर |
सआदत खान | महू |
रानी अवंतिबाई | रामगढ़ |
भीमा नायक | मंडलेश्वर (खरगोन) |
गिरधारी बाई (अवंतिबाई की अंगरक्षक) | रामगढ़ |
शंकरशाह | गढ़ मंडला |
श्री बहादुर | मंडला |
देवी सिंह | मंडला |
सुरेन्द्र भाई | संबलपुर (छत्तीसगढ़) |
डेलनशाह | नरसिंहपुर |
1857 की क्रांति में मध्य प्रदेश के कई वीर योद्धाओं और वीरांगनाओं ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया। यह विद्रोह भले ही सफल न हो सका, लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी और आगे चलकर 1947 में भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।
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