कलचुरि राजवंश (मध्य प्रदेश)

कलचुरि राजवंश

मध्य प्रदेश का इतिहास अनेक शक्तिशाली राजवंशों से जुड़ा रहा है, जिनमें से एक महत्वपूर्ण राजवंश कलचुरि वंश था। यह वंश प्राचीन भारत में खासकर महाकोशल, मालवा और बुंदेलखंड क्षेत्र में शासन करने के लिए प्रसिद्ध था। कलचुरियों की राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत ने मध्य प्रदेश के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।
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इस लेख में हम कलचुरि राजवंश की उत्पत्ति, उनके प्रमुख शासक, प्रशासनिक व्यवस्था, कला, संस्कृति और मध्य प्रदेश में उनकी विरासत पर विस्तृत चर्चा करेंगे। साथ ही, इस वंश के ऐतिहासिक महत्व और उनके शासनकाल में हुए प्रमुख घटनाक्रमों का भी विश्लेषण करेंगे।
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महिष्मती शाखा

माहिष्मती का कलचुरि वंश अत्यंत प्राचीन था, जिसमें अनेक प्रतापी राजा हुए थे। इन्होंने अपना कलचुरि संवत् 248 ई. में स्थापित किया था।
  • पुराणों में हैहय कलचुरियों का उल्लेख मिलता है, जो कार्तवीर्य अर्जुन के वंशज थे। इस वंश के केवल तीन शासकों के नाम ज्ञात हुए हैं- कृष्णराज (लगभग 550-575 ई.) उसका पुत्र शंकरगण (लगभग 575-600 ई.) तथा पौत्र बुद्धराज (600 ई.)।
  • इस राजवंश का वास्तविक संस्थापक कृष्णराज था। कृष्णराज के चाँदी के सिक्के नासिक, अमरावती, बैतूल और जबलपुर से प्राप्त हुए हैं। इन मुद्राओं पर एक ओर राजा की आकृति है और दूसरी ओर नंदी की आकृति तथा ब्राह्मी अक्षरों में परममाहेश्वर माता पितृ पादानुध्यात श्री कृष्णराज लिखा हुआ है।
  • शंकरगण (576-600 ई.) का अधिपत्र नासिक जिले के अमोना से प्राप्त हुआ है, जो उज्जैन के विजयी शिविर से जारी किया गया था। बुद्धराज (शंकरगण का पुत्र) के समय में बतनगर (नासिक जिले के चांदेर तालुक में बड़नेर) में भूमिदान के उद्देश्य से विदिशा से बड़नेर अनुदान जारी किया गया था।

त्रिपुरी शाखा

वामराज (675-700 ई.) ने डाहाल में त्रिपुरी शाखा की स्थापना की, जिसका विस्तार गोमती नदी से नर्मदा नदी तक था तथा इसकी राजधानी त्रिपुरी (जबलपुर) थी। कलचुरि वंश का सुयोग्य एवं वास्तविक संस्थापक कोक्कल प्रथम ( 850-890 ई.) था। उसने कन्नौज के प्रतिहार राजा भोज प्रथम से युद्ध किया था।
कोक्कल प्रथम की पुत्री का विवाह राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण द्वितीय के साथ हुआ था। उसके पश्चात् उसका बड़ा पुत्र मुग्धतुंग त्रिपुरी का शासक नियुक्त हुआ। वह एक महान योद्धा था। जिसने पूर्वी समुद्र के किनारे तक विजय प्राप्त की और दक्षिण कोशल के सोमवंशियों से पाली (बिलासपुर जिला) छीन लिया। मुग्धतुंग के पश्चात् बालहर्ष (910-915 ई.) एवं युवराज देव प्रथम इस वंश के शासक हुए।
  • युवराज देव प्रथम (915-945 ई.) साहित्य का महान आश्रयदाता था। बाल रामायण, बाल भारत, कर्पूरमंजरी तथा काव्य मीमांसा के रचयिता राज शेखर उसकी साहित्य मंडली के दैदीप्यमान् नक्षत्र थे। युवराज देव ने अपनी पटरानी नोहला की इच्छानुसार मत्तमयूर कुल के अनेक आचार्यों को आमंत्रित कर उनके लिए गुरगी (रीवा जिला), चंद्रेही बिलहरी तथा अन्य स्थानों पर शिव के उत्कृष्ट मंदिरों और मठों का निर्माण करवाया था।
  • भेड़ाघाट में अपनी राजधानी के समीप ही उसने एक गोलाकार एवं खुले (छत रहित) चौंसठ योगिनी (गोलकी मंदिर) मंदिर का निर्माण करवाया। इनके समीप स्थित मठ गोलकी मठ कहलाता है। उसकी रानी नोहला ने दमोह जिले के नोहटा में नोहलेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया था। युवराज प्रथम का एक बहुत ही योग्य एवं बुद्धिमान मंत्री भाकमिश्र था, जो विद्दशाल भंजिका में वर्णित भागुरायण का ही दूसरा नाम है। युवराज देव प्रथम का एक अन्य मंत्री गोल्लक था, जिसका शिलालेख बांधवगढ़ में मिला है। उसने वहाँ चट्टानों पर विष्णु के अवतारों की प्रतिमाओं को उत्कीर्ण करवाया था।
  • युवराज देव प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र लक्ष्मणराज (लगभग 945-47 ई.) सिंहासन पर बैठा। लक्ष्मणराज संभवत: पश्चिमी चालुक्य मूलराज का समकालीन था। कारी तलाई (जबलपुर) शिलालेख से पांड्य देश पर उसके आक्रमण की पुष्टि होती है।
  • लक्ष्मणराज ने बिलहरी का मठ जबलपुर मत्तमयूर शाखा के हृदयशिव नामक शैवगुरु को सौंप दिया था, उसने कारी तलाई (मुड़वारा, जिला कटनी) के विष्णु मंदिर के लिए अनेक गाँव दान किए थे।
  • लक्ष्मणराज ने अपनी कन्या बोंथादेवी का विवाह चालुक्य वंशीय विक्रमादित्य चतुर्थ से किया था। बोंथा देवी का पुत्र तैलप द्वितीय था, उसने दक्षिण के राष्ट्रकूटों को पराजित कर वहाँ चालुक्य वंश की स्थापना की थी। लक्ष्मण राज के दोनों पुत्रों ने त्रिपुरी पर शासन किया। युवराज देव द्वितीय (980-990 ई.) के समय मालवा के राजा मुंज ने त्रिपुरी पर आक्रमण करके उसे पराजित कर दिया। इस युद्ध में अनेक कलचुरि सेनापति मारे गए तथा युवराज त्रिपुरी से भाग गया। मुंज के वापस जाने के उपरांत युवराज के सामंत युद्ध के समय युवराज द्वारा दिखायी गई कायरता से अत्यधिक आक्रोशित हुए और उसे पुनः सिंहासन पर न बैठाकर उसके अल्पवयस्क पुत्र कोक्कल देव द्वितीय (990-1015 ई.) को राजा बना दिया।
कोक्कल देव द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र गांगेयदेव (1015 ई.) राजा बना, जिसने कलचुरि को पुनः शक्तिशाली बनाया।
उसने भोज तथा राजेन्द्र चोल के साथ एक राज्य संघ का गठन किया तथा चालुक्य नरेश जयसिंह द्वितीय पर तीन ओर से आक्रमण किया, परन्तु यह आक्रमण असफल सिद्ध हुआ। इसके पश्चात् गांगेयदेव ने अपनी शक्ति पूर्व की ओर लगा दी तथा समुद्र तट के समीप कई स्थानों पर विजय प्राप्त की। इसी समय परमार वंश के राजा भोज से भी उसका युद्ध हुआ, जिसमें भोज परास्त हुआ। महोबा से प्राप्त एक चंदेल शिलालेख में गांगेयदेव को विश्वजीत कहा गया है।
  • अलबरूनी ने अपने भौगोलिक विवरण में गांगेयदेव का उल्लेख डाहल के शासक के रूप में किया, जिसकी राजधानी त्रिपुरी थी। गांगेयदेव ने लक्ष्मी के छाप वाले सोने के सिक्के जारी किये जो कि चंदेलों, गहड़वालों और तोमरों में लोकप्रिय थे। ये सिक्के सुदूर कश्मीर तक उपयोग में लाये जाते थे।
  • गांगेयदेव अपनी मृत्यु के पूर्व अपना राज्यसिंहासन कर्णदेव को सौंपकर प्रयाग चला गया, जहाँ अक्षयवट के समीप उसकी मृत्यु हो गयी। गांगेयदेव का पुत्र लक्ष्मीकर्ण या कर्णदेव (1041-1072 ई.) कलचुरि राजाओं में सबसे अधिक प्रतापी राजा हुआ था।
  • कर्णदेव ने पश्चिम बंगाल के एक भाग को कुछ समय तक अपने अधिकार क्षेत्र में रखा। उसने दक्षिण के चोल, कुन्तल (कनारा जिला), पाड्व आदि शासकों को पराजित किया तथा मालवा के शासक राजाभोज को पराजित करने के लिए गुजरात के शासक भीम प्रथम से संधि की, परन्तु स्वयं संधि का उल्लंघन करते हुए सम्पूर्ण मालवा पर अधिकार कर लिया। चंदेल राजा (कीर्तिवर्मन) से जीत के उपलक्ष्य में उसने प्रबोध चंन्द्रोदय प्रहसन का अभिनय करवाया था। कर्ण की निरंतर सैन्य उपलब्धियों के कारण उसे हिन्द का नेपोलियन कहा जाता है।
  • विजयों से परिपूर्ण जीवन के अंतिम समय में कर्ण अनेक बार पराजित हुआ। ऐसा माना जाता है कि वह पाँच राजाओं यथा कीर्तिवर्मन परमार उदयादित्य पाल विग्रहपाल तृतीय, कल्याणी के चालुक्य सोमेश्वर प्रथम तथा अन्हिलवाड़ के चालुक्य भीम प्रथम से भी युद्ध में पराजित हुआ था।
उसने अपना विवाह हूण वंशीय अवल्लदेवी से किया था। जिसका पुत्र यश कर्णदेव था। कर्ण ने जीवित अवस्था में ही अपना राज्य यशकर्ण को सौंप दिया था। कर्ण वस्तुतः एक शक्तिशाली शासक, महान् निर्माता तथा धर्म एवं साहित्य का आश्रयदाता था।
कर्ण ने बनारस में कर्णमेरु नामक बारह खंड के मंदिर का निर्माण करवाया था, जो शिव को समर्पित किया गया था। उसने जबलपुर के समीप अपने नाम पर कर्णावती नगर बसाया था।
अमरकंटक के मंदिरों का निर्माण कर्ण के द्वारा करवाया गया था। कर्ण के उत्तराधिकारी यशकर्ण (1073-1123 ई०) द्वारा तेलंगाना लूट से प्राप्त संपत्ति को वहाँ के भीमेश्वर शिवालय को भेंट कर दिया गया था।
कन्नौज के गोविन्दचन्द्र ने इसके राज्य के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया था। इसके पश्चात् कलचुरि शासक यशकर्ण का पुत्र गयकर्ण (1123-1151 ई०) शासक बना। गयकर्ण के समय कलचुरि वंश शक्तिहीन हो गया। गयकर्ण का विवाह मेवाड़ के गुहिलवंशीय विजयसिंह की पुत्री अल्हणदेवी से तथा मालवा नरेश उदयादित्य की पुत्री श्यामल देवी से हुआ था। गुहिल राजकुमारी से दो पुत्र नरसिंह तथा जयसिंह हुए। उसके उत्तराधिकारी नरसिंह (1153-1163 ई.) से सम्बंधित भेड़ाघाट शिलालेख (1155 ई.) के अनुसार अल्हणदेवी द्वारा वैद्यनाथ नामक शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया, जिसके साथ एक मठ, एक व्याख्यानशाला एवं उद्यान का निर्माण भी करवाया। नरसिंह के पश्चात् उसका भाई जयसिंह देव गद्दी पर बैठा। अपने शासनकाल के अंत में जयसिंह को संभवतः चंदेल राजा परमार्दिदेव (1165-1203 ई.) की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी थी। जबलपुर से लगभग 16 किमी. दूर गोसलपुर गाँव जयसिंह की पत्नी रानी गोसलदेवी के नाम पर बसाया गया था।
कलचुरि वंश का अंतिम शासक विजय सिंह था। मलकापुरम शिलालेख के अनुसार, कलचुरि शासन 1240 ई. तक प्रतिष्ठित रहा।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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