जंगल सत्याग्रह (मध्य प्रदेश)

जंगल सत्याग्रह (मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम में जंगल सत्याग्रह का एक महत्वपूर्ण स्थान है। वर्ष 1930 में बैतूल जिले के घोड़ा-डोगरी क्षेत्र में आदिवासियों ने इस आंदोलन की शुरुआत की। यह आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा प्रारंभ किए गए नमक सत्याग्रह से प्रेरित था और इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार द्वारा वन संसाधनों पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करना था।
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जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व  

इस आंदोलन का नेतृत्व प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों डी. पी. मिश्रा, लालाराम वाजपेयी सहित अन्य स्थानीय नेताओं ने किया। आदिवासी समाज ने भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।

जंगल सत्याग्रह के प्रमुख केंद्र  

यह आंदोलन केवल बैतूल तक सीमित नहीं था, बल्कि मध्य प्रदेश के अन्य कई हिस्सों में भी व्यापक रूप से फैल गया। आंदोलन के प्रमुख केंद्र थे:
  • बैतूल
  • बंजारी ढाल
  • छिंदवाड़ा
  • ओरछा
  • सिवनी
  • टुरिया
  • घुनघुटी
  • हरदा

आदिवासी प्रतिरोध और गंजन सिंह कोरकू की भूमिका  

जंगल सत्याग्रह के दौरान बैतूल जिले के घोड़ा-डोंगरी क्षेत्र के आदिवासी समुदाय ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध खुला विरोध दर्ज किया। वे कंधे पर कंबल डालकर और हाथ में लाठी लेकर अंग्रेजों के दमनकारी नीतियों का प्रतिकार करने जंगलों से बाहर आ गए थे। इस संघर्ष का नेतृत्व गंजन सिंह कोरकू ने किया, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के वन कानूनों को चुनौती दी और अपने समुदाय के हक की आवाज बुलंद की।
जंगल सत्याग्रह मध्य प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने आदिवासी समाज को एक नई चेतना दी। यह आंदोलन अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण वन कानूनों का विरोध करने और अपने पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए लड़ा गया था। स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समाज की भूमिका को रेखांकित करने वाला यह आंदोलन आज भी संघर्ष और साहस का प्रतीक बना हुआ है।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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