तोमर वंश (मध्य प्रदेश)
ग्वालियर का इतिहास वीरता, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक रहा है। विशेष रूप से तोमर राजवंश ने यहाँ 125 वर्षों तक शासन किया और इस क्षेत्र को एक नई पहचान दी। इस लेख में ग्वालियर के तोमर राजाओं के उत्थान और पतन की पूरी गाथा विस्तार से प्रस्तुत की गई है।
"ग्वालियर के तोमर राजाओं का मूल स्थान तँवरघर था। गोपांचल (ग्वालियर) के उत्तर में स्थित मुरैना के आस-पास के क्षेत्र को तँवरघर (तोमरगृह) कहा जाता था। ग्वालियर के तोमर वंश की स्थापना 1394 ई. में वीरसिंह देव ने की थी। उसने वीर सिंह व लोक (1382 ई.) नामक ग्रंथों की रचना की।
उसे सुल्तान अलाउद्दीन सिकन्दरशाह ने गोपांचल गढ़ (ग्वालियर) का प्रशासक नियुक्त किया था। 1400 ई. में वीरसिंह देव की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र उद्धरणदेव (1400 से 1402 ई.) ग्वालियर का राजा बना। 1402 ई. में दिल्ली के सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद तुगलक के प्रधानमंत्री मल्लू इकबाल खाँ ने आक्रमण किया, जिसका सामना वीरसिंह के पुत्र वीरदेव ने किया था। मितावली में गोल मंदिर के पास प्राप्त शिलालेख में वीरदेव को उसकी वीरता के कारण तेजोरत्तम् कहा गया है। इसके पश्चात् ग्वालियर के अगले शासक गणपति देव (1423-25 ई.) बने। गणपतिदेव के शासनकाल में मालवा के शासक होशंगशाह ने ग्वालियर में विजय प्राप्त करने के असफल प्रयास किए।
- गणपति देव के बाद उसका पुत्र डूगरेन्द सिंह (1425-54 ई.) ग्वालियर का शासक बना। डूंगरेन्द सिंह के बाद उसका पुत्र कीर्ति सिंह या कीर्तिपाल (1459-80 ई.) ग्वालियर का शासक बना। उसके शासन काल के दौरान बहलोल लोदी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और इसमें गढ़ कुंडार के मलखान सिंह ने उसे सहायता प्रदान की थी। इसके पश्चात्, कल्याण मल (1480-86 ई.) ग्वालियर का शासक बना। कल्याण मल को भूपमुनि कहा गया है। उसने सुमेलचित नामक ग्रंथ की रचना की थी।
- कल्याण मल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र मानसिंह तोमर था जो इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था। उसने 1486-1516 ई. तक ग्वालियर में शासन किया, जिसका उल्लेख रोहिताश्वगढ़ शिलालेख में मिलता है।
- 1500 ई. में मानसिंह ने अपने प्रतिनिधि निहाल सिंह को सिकन्दर लोदी के दरबार में भेजा था। 1517 ई. में इब्राहिम लोदी ने ग्वालियर पर आक्रमण करके यहाँ का किला जीत लिया। इस युद्ध में मानसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ। मानसिंह ने ग्वालियर के किले में मान मंदिर तथा गुजरी महल का निर्माण करवाया था। संगीत के प्रमुख ग्रंथ मान कौतुहल की रचना मानसिंह ने की थी। मानसिंह द्वारा सिंचाई हेतु अनेक झीलों का निर्माण करवाया गया था।
प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा ने अपने उपन्यास मृगनयनी में मानसिंह और उनकी गुर्जरी रानी मृगनयनी का चित्रण किया है।
मानसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र विक्रमादित्य (1517-1523 ई.) गद्दी पर बैठा। विक्रमादित्य तोमर वंश का अन्तिम शासक था, जो पानीपत के प्रथम युद्ध (1526 ई.) में मारा गया था। इस प्रकार 125 वर्षों में ग्वालियर राज्य के तोमर राजवंश का अन्त हो गया।
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