गुर्जर प्रतिहार वंश (मध्य प्रदेश)
गुर्जर प्रतिहार वंश भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण साम्राज्य रहा है, जिसने उत्तरी और मध्य भारत पर कई वर्षों तक शासन किया। इस वंश का प्रभाव मध्य प्रदेश में भी व्यापक रूप से रहा, विशेष रूप से मालवा और उसके आसपास के क्षेत्रों में।
इस लेख में हम गुर्जर प्रतिहार वंश के उदय, शासन, महत्वपूर्ण शासकों और उनके प्रशासनिक योगदान पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना
8वीं शताब्दी की शुरुआत में हरिश्चंद्र नामक शासक द्वारा गुर्जर प्रतिहार वंश की एक शाखा मालवा में स्थापित की गई। इसके बाद, हरिश्चंद्र के पुत्र नागभट्ट प्रथम ने 730 ईस्वी के आसपास मालवा (उज्जैन) में गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना की। नागभट्ट प्रथम के पश्चात उसके पुत्र कुक्कुस्थ और देवराज ने शासन किया। इसके बाद देवराज का पुत्र वत्सराज गद्दी पर बैठा।
वत्सराज (778 ई.) का शासन
वत्सराज को जैन ग्रंथ कुवलयमाला और हरिवंश पुराण में 778 ईस्वी में सिंहासन पर बैठने का उल्लेख मिलता है। इस दौरान प्रतिहारों ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया और अपनी शक्ति को और मजबूत किया।
नागभट्ट द्वितीय (805-833 ई.) का शासन
वत्सराज के बाद उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय 805-833 ईस्वी तक प्रतिहार शासक बना। विभिन्न अभिलेखों के अनुसार, नागभट्ट द्वितीय ने आंध्र, सैन्धव, विदर्भ और कलिंग के नरेशों को पराजित किया। उसने अपने साम्राज्य की सीमाओं को विस्तृत करते हुए प्रतिहार शक्ति को मजबूती प्रदान की।
मिहिर भोज (836-882 ई.): स्वर्णकाल का शासक
नागभट्ट द्वितीय के बाद उसका पुत्र रामभद्र एक दुर्बल शासक सिद्ध हुआ, परंतु रामभद्र का पुत्र मिहिर भोज (836-882 ईस्वी) प्रतिहार वंश का सबसे शक्तिशाली शासक साबित हुआ। उसने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया और अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में मालवा, राजपूताना और मध्य प्रदेश में अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया। मिहिर भोज के शासनकाल को प्रतिहार साम्राज्य का स्वर्णकाल कहा जाता है।
मिहिर भोज से जुड़े ऐतिहासिक अभिलेख
- दौलतपुर अभिलेख में मिहिर भोज को प्रभास की उपाधि से विभूषित किया गया है।
- ग्वालियर अभिलेख में उसे आदि वराह कहा गया है।
- सागरताल प्रशस्ति में भी मिहिर भोज का उल्लेख मिलता है।
- कुछ मुद्राओं पर भी मिहिर भोज को आदि वराह कहा गया है।
ग्वालियर और सागरताल अभिलेखों से यह जानकारी मिलती है कि इस काल में स्थानीय प्रशासन और व्यापार की उन्नति हुई थी।
महेन्द्र पाल प्रथम (885-910 ई.) का शासन
मिहिर भोज के पश्चात् उसका पुत्र महेन्द्र पाल प्रथम सिंहासन पर बैठा। उसे निर्भय राजा कहा जाता था। उसने पूर्व दिशा में अपने राज्य का विस्तार किया। महेन्द्र पाल प्रथम के शासनकाल में प्रतिहार साम्राज्य हिमालय से लेकर विन्ध्याचल तक और पूर्वी समुद्र तट से लेकर पश्चिमी समुद्र तट तक विस्तृत था।
भोज द्वितीय (910-912 ई.) और महिपाल (912-944 ई.)
महेन्द्र पाल प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र भोज द्वितीय राजा बना, परंतु उसे अपदस्थ कर उसका सौतेला भाई महिपाल (912-944 ईस्वी) गद्दी पर बैठा। महिपाल के शासनकाल में 915-918 ईस्वी के बीच राष्ट्रकूट राजा इन्द्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण किया और उसे लूटा। हालाँकि, इन्द्र तृतीय के वापस जाने के बाद महिपाल ने अपने खोए हुए साम्राज्य के बड़े भाग पर पुनः अधिकार कर लिया।
महिपाल के समय, 940 ईस्वी के आसपास, राष्ट्रकूटों ने पुनः उत्तरी भारत पर आक्रमण किया और कालिंजर और चित्रकूट के दुर्गों पर अधिकार कर लिया।
महेन्द्र पाल द्वितीय (944-946 ई.) और प्रतिहार साम्राज्य का पतन
महिपाल के पश्चात् उसके पुत्र महेन्द्र पाल द्वितीय ने 946 ईस्वी तक शासन किया। उसके बाद के शासक कमजोर सिद्ध हुए। प्रतापगढ़ शिलालेख के अनुसार, 946 ईस्वी तक मालवा प्रतिहार साम्राज्य का हिस्सा रहा।
देवपाल (948 ईस्वी) के शासनकाल में प्रतिहार साम्राज्य का विघटन शुरू हुआ। धीरे-धीरे, प्रतिहारों की शक्ति का लगातार पतन होता चला गया। अंततः यह साम्राज्य अन्हिलवाड़ के चालुक्यों, जेजाकभुक्ति के चंदेलों, डाहाल के चेदियों, मालवा के परमारों, दक्षिणी राजपूताना के गुहिलों, शाकम्भरी के चौहानों और ग्वालियर के कच्छपघातों में विभाजित हो गया।
गुर्जर प्रतिहार वंश ने मध्य भारत में विशेषकर मालवा और उसके आस-पास के क्षेत्रों में एक सशक्त साम्राज्य की स्थापना की। मिहिर भोज के शासनकाल को इस वंश का स्वर्णकाल माना जाता है, जब साम्राज्य का विस्तार और प्रशासनिक व्यवस्था अपने चरम पर थी। हालांकि, महेन्द्र पाल द्वितीय के बाद धीरे-धीरे इस वंश का पतन होने लगा और अंततः विभिन्न शक्तिशाली वंशों ने इसे अपने-अपने क्षेत्रों में विभाजित कर लिया।
मध्य प्रदेश के इतिहास में गुर्जर प्रतिहारों का योगदान उल्लेखनीय रहा है, जिसने इस क्षेत्र की सांस्कृतिक, राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला। आज भी उनके शासकों द्वारा बनाए गए किले, अभिलेख और स्थापत्य कला इस गौरवशाली अतीत की झलक देते हैं।
2. मध्य प्रदेश का इतिहास
- पुरापाषाण काल
- मध्यपाषाण काल
- नवपाषाण काल
- ताम्रपाषाण काल
- मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति
- ऐतिहासिक काल (लौह युग)
- वैदिक सभ्यता
- पौराणिक कालखण्ड
- महाजनपद काल
- मौर्य काल
- शुंग वंश
- सातवाहन वंश
- हिन्द-यवन
- शक वंश
- कुषाण वंश
- नागवंश
- आभीर वंश
- बोधि और मघ
- वाकाटक वंश
- गुप्त वंश
- औलिकर वंश
- परिव्राजक और उच्चकल्प
- पाण्डु वंश
- परवर्ती गुप्त एवं मौखरि वंश
- कलचुरि राजवंश
- चंदेल
- राष्ट्रकूट
- गुर्जर-प्रतिहार वंश
- मालवा का परमार वंश
- दिल्ली सल्तनत
- मालवा में स्वतंत्र मुस्लिम सल्तनत की स्थापना
- निमाड़ में फारूकी शासन
- मुगल काल
- गढ़ा का गोंड वंश
- तोमर वंश
- बुंदेला वंश
- बघेलखण्ड राज्य
- मध्य प्रदेश में आधुनिक काल का इतिहास
- होल्कर रियासत
- सिंधिया वंश
- भोपाल रियासत
- भोपाल की बेगमें
- मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रमुख विद्रोह
- मध्य प्रदेश में 1857 की क्रांति
- राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में मध्य प्रदेश की भूमिका
- झण्डा सत्याग्रह
- जंगल सत्याग्रह
- मध्य प्रदेश में नमक सत्याग्रह
- चरणपादुका नरसंहार
- पंजाब मेल हत्याकांड
- सोहाबल का नरसंहार
- स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अन्य गतिविधियाँ
- भोपाल राज्य का स्वतंत्रता संघर्ष
- भोपाल का जलियाँवाला काण्ड
- रीवा का चावल आंदोलन
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