गुप्त वंश (मध्य प्रदेश)
गुप्त वंश भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण और गौरवशाली काल रहा है, जिसे ‘स्वर्ण युग’ के रूप में भी जाना जाता है। इस वंश के शासकों ने भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े हिस्से पर शासन किया और कला, साहित्य, स्थापत्य, तथा प्रशासन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मध्य प्रदेश के कई ऐतिहासिक स्थल गुप्त वंश की उपस्थिति और उनके प्रभाव को दर्शाते हैं। इस लेख में हम गुप्त शासकों के मध्य प्रदेश से संबंध, विजय अभियानों, प्रमुख अभिलेखों और गुप्तकालीन स्थापत्य कला का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
गुप्त वंश के सर्वाधिक पराक्रमी शासक समुद्रगुप्त (335 ई. से 380 ई.) ने मध्य तथा दक्षिण भारत के राज्यों पर विजय प्राप्त कर विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। समुद्रगुप्त अपने विजय अभियान के समय सागर से प्रवेश कर दमोह, जबलपुर, मंडला होते हुए दक्षिण की ओर गया था।
इस अभियान के दौरान उसने विदिशा के शक सामन्त श्रीधरवर्मन् पर आक्रमण कर उसे पराजित किया था। इस विजय की स्मृति में उसने सागर जिले के एरण में एक स्मारक का निर्माण किया। एरण को समुद्रगुप्त के स्वभोग नगर के नाम से जाना जाता था।
- समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तम्भ से समुद्रगुप्त द्वारा पराजित अनेक जनजातियों में खर्परिक तथा सनकानिक का उल्लेख है। माना जाता है कि खर्परिक दमोह जिले के बटियागढ़ में पाए गए दो शिलालेखों में उल्लिखित खर्परिकों के पूर्वज थे। परिव्राजक नृपहस्तिन के ताम्र फलक पर उत्कीर्ण लेखों में ऐसे अट्ठारह वन राज्यों का उल्लेख है, जिन्हें समुद्रगुप्त ने पराजित किया था उनमें एक डाभाल भी था। डाभाल की राजधानी त्रिपुरी थी, जो जबलपुर के आसपास का क्षेत्र था।
- सम्राट चन्द्रगुप्त को अपने मंत्रियों और सामंतों के साथ मालवा में एक लम्बी अवधि के लिए रुकना पड़ा था। इस तथ्य की पुष्टि विदिशा के निकट उदयगिरि के वीरसेन शाब के गुफा अभिलेख से होती है। इस गुफा अभिलेख में कहा गया है कि वह (शाब) यहाँ (पूर्वी मालवा) आया। उसके साथ स्वयं राजा चन्द्रगुप्त भी थे, जो सम्पूर्ण विश्व पर विजय पाने के अभिलाषी थे।
वीरसेन शाब चन्द्रगुप्त द्वितीय का मंत्री तथा युद्ध व शांति विभाग का अधिकारी था। इसके अतिरिक्त सैन्य अधिकारी आम्रकार्दव के साँची अभिलेख व चन्द्रगुप्त के सामंत सनकानिक महाराज के उदयगिरी शिलालेख भी इस क्षेत्र में गुप्तों के आधिपत्य की पुष्टि करते हैं। चन्द्रगुप्त द्वितीय को श्रेष्ठतम् नगर उज्जैन और श्रेष्ठनगर पाटलिपुत्र का स्वामी कहा गया है। गुप्तकालीन काय नामक सिक्के विदिशा तथा साकौर से प्राप्त हुए। दमोह जिले की हटा तहसील के ग्राम साकौर, रौंद तथा कुण्डलपुर में विद्यमान गुप्त स्थापत्य शैली के विखण्डित मंदिरों से यहाँ पर गुप्त राजाओं के अधिपत्य की पुष्टि होती है। साकौर में उत्खनन से 24 स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं, जिन पर तीन गुप्त राजाओं के नाम अंकित हैं। इनमें से 8 सिक्के समुद्रगुप्त के 15 सिक्के चन्द्रगुप्त के तथा 1 स्कन्दगुप्त का है।
मध्य प्रदेशः गुप्तकालीन अभिलेख
अभिलेख | महत्वपूर्ण तथ्य |
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मन्दसौर अभिलेख | गुप्त सम्राट कुमार गुप्त द्वितीय के शासनकाल का मन्दसौर (दशपुर) अभिलेख प्राप्त हुआ जो पश्चिमी मालवा में स्थित है। इन्होंने दशपुर में एक सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था। यह अभिलेख साहित्यिक संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण करवाया गया था, जिससे तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक अवस्था पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। |
उदयगिरी शिलालेख | विदिशा जिले में स्थित इस अभिलेख में शंकर नामक व्यक्ति द्वारा इस स्थान पर पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित किये जाने का उल्लेख है। |
साँची अभिलेख | रायसेन जिले के साँची से प्राप्त इस अभिलेख में हरिस्वामिनी द्वारा काकनादबोट में स्थित यहाँ के आर्य संघ को धन दान में दिये जाने का उल्लेख किया गया है। |
तुमैन अभिलेख | गुना जिले में स्थित इस अभिलेख में राजा कुमार गुप्त को शरद्कालीन सूर्य की भाँति बताया गया है। |
एरण अभिलेख | यह अभिलेख सागर जिले में स्थित है। गुप्तकाल में इसका नाम स्वभोग नगर था। एरण अभिलेख हूणों की उपस्थिति को दर्शाता है। |
- कुमारगुप्त के शासनकाल में भारतवर्ष पर हूणों के आक्रमण प्रारंभ हो गये थे। स्कन्दगुप्त ने हूणों के विरुद्ध अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, उन्हें पराजित किया, परन्तु हूणों के बार-बार आक्रमण से गुप्त सामाज्य को आघात पहुँचा। यद्यपि बुद्धगुप्त (477-500 ई.) के एरण शिलालेख से ज्ञात होता है, कि सागर क्षेत्र में गुप्त राज्य बना रहा।
- ग्वालियर अभिलेख में बताया गया है कि, हूण शासक मिहिरकुल ने मन्दसौर जिले में एक सूर्य मंदिर बनवाया था किन्तु मिहिर कुल की सफलता स्थायी नहीं रही। उसे मालवा के यशोधर्मन और मगध के नरसिंह गुप्त बालादित्य ने 530 ई. के आसपास परास्त कर दिया था। इसके बाद मिहिरकुल का राज्य कश्मीर, गांधार और सिंधु नदी के पश्चिम के कुछ भागों तक सीमित रह गया। मध्य प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र में गुप्त शासकों से सम्बंधित अनेक पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। जबलपुर जिले में तिगवा का विष्णु मंदिर, बघेलखण्ड के नागौद में भूमरा का शिवमंदिर, अजयगढ़ का नचनाकुठार स्थित पार्वती मंदिर, साँची का बौद्ध मंदिर, नागौद के खोह ग्राम में शिवमंदिर गुप्तकालीन मंदिर हैं। गुप्तकालीन चित्रकला के साक्ष्य बाघ गुफाओं से प्राप्त होते हैं। धार जिले में स्थित बाघ गुफाओं के चित्रों की तुलना अजंता गुफा के चित्रों से की जाती है।
2. मध्य प्रदेश का इतिहास
- पुरापाषाण काल
- मध्यपाषाण काल
- नवपाषाण काल
- ताम्रपाषाण काल
- मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति
- ऐतिहासिक काल (लौह युग)
- वैदिक सभ्यता
- पौराणिक कालखण्ड
- महाजनपद काल
- मौर्य काल
- शुंग वंश
- सातवाहन वंश
- हिन्द-यवन
- शक वंश
- कुषाण वंश
- नागवंश
- आभीर वंश
- बोधि और मघ
- वाकाटक वंश
- गुप्त वंश
- औलिकर वंश
- परिव्राजक और उच्चकल्प
- पाण्डु वंश
- परवर्ती गुप्त एवं मौखरि वंश
- कलचुरि राजवंश
- चंदेल
- राष्ट्रकूट
- गुर्जर-प्रतिहार वंश
- मालवा का परमार वंश
- दिल्ली सल्तनत
- मालवा में स्वतंत्र मुस्लिम सल्तनत की स्थापना
- निमाड़ में फारूकी शासन
- मुगल काल
- गढ़ा का गोंड वंश
- तोमर वंश
- बुंदेला वंश
- बघेलखण्ड राज्य
- मध्य प्रदेश में आधुनिक काल का इतिहास
- होल्कर रियासत
- सिंधिया वंश
- भोपाल रियासत
- भोपाल की बेगमें
- मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रमुख विद्रोह
- मध्य प्रदेश में 1857 की क्रांति
- राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में मध्य प्रदेश की भूमिका
- झण्डा सत्याग्रह
- जंगल सत्याग्रह
- मध्य प्रदेश में नमक सत्याग्रह
- चरणपादुका नरसंहार
- पंजाब मेल हत्याकांड
- सोहाबल का नरसंहार
- स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अन्य गतिविधियाँ
- भोपाल राज्य का स्वतंत्रता संघर्ष
- भोपाल का जलियाँवाला काण्ड
- रीवा का चावल आंदोलन
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