चंदेल वंश (मध्य प्रदेश)

चंदेल वंश

चंदेल वंश मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजवंश था, जिसने 9वीं से 13वीं शताब्दी तक बुंदेलखंड क्षेत्र पर शासन किया। इस वंश ने कई ऐतिहासिक किलों और मंदिरों का निर्माण किया, जिनमें खजुराहो के विश्व प्रसिद्ध मंदिर शामिल हैं। चंदेल शासक वीरता, कला, संस्कृति और स्थापत्य कला के संरक्षक माने जाते थे। इनके शासनकाल में बुंदेलखंड क्षेत्र में सुरक्षा और समृद्धि स्थापित हुई।
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इस लेख में हम चंदेल वंश के उदय, प्रमुख शासकों, शासन व्यवस्था, सांस्कृतिक योगदान और पतन के कारणों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
चंदेल शासक आरंभ में प्रतिहारों के सामंत थे। वे स्वयं को चन्द्रदेवता एवं काशी के गहड़वाल नरेश के राजपुरोहित की पुत्री हेमवती की संतान मानते थे।
लोक मान्यताओं के अनुसार, इनका मूल निवास स्थान छतरपुर जिले में मनियागढ़ था किन्तु पुरालेखों के अनुसार इस राजवंश की प्राचीन राजधानी खरजुरवाहक (वर्तमान खजुराहो) थी।
  • ऐतिहासिक दृष्टि से चंदेल वंश का संस्थापक नन्नुक था, जिसने 9वीं शताब्दी के आरंभ में कन्नौज के चन्द्रवर्मा शासकों के सामंत के रूप में खजुराहो के समीपस्थ क्षेत्रों पर शासन किया था। इसके पश्चात् उसका पुत्र वाक्पति राजा बना।
  • वाक्पति अपनी सैन्य क्षमताओं और बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध था, जिसने अपना राज्य विंध्य पर्वत तक विस्तृत किया था। विंध्य पर्वत को उसका आनंद धाम कहा गया है। वाक्पति का पुत्र जयशक्ति या जेजाक या जेजा हुआ जिसके नाम पर चंदेलों का प्रदेश जेजाकभुक्ति (वर्तमान बुंदेलखंड) कहलाया।
  • जयशक्ति के पश्चात् उसका भाई विजयशक्ति या विज्जक राजा बना, जिसने आसपास के कुछ क्षेत्रों को जीत कर चंदेल साम्राज्य का विस्तार कर लिया था। उसके पश्चात् उसका पुत्र राहिल गद्दी पर बैठा, जिसने महोबा को जीत लिया था। राहिल के बाद उसका पुत्र हर्षदेव (900-925 ई.) खजुराहो का शासक बना।
  • हर्ष देव के शासनकाल में चंदेलों की गणना उत्तरी भारत के शक्तिशाली राजवंशों में की जाने लगी। 925 ई. में हर्ष देव का पुत्र यशोवर्मन या लक्ष्मणवर्मन सिंहासन पर बैठा।
खजुराहो के शिलालेखों में यशोवर्मन की हिमालय से लेकर मालवा तक और कश्मीर से बंगाल तक विस्तृत विजय अभियानों की प्रशंसा की गई है। इन पुरालेखों में उसके गोंड, कोसल, कश्मीर, मिथिला, चेदि और गुर्जर प्रदेशों एवं कालिंजर किले पर विजय का वर्णन किया गया है।

चतुर्भुज मंदिर, खजुराहो
देवपाल से यशोवर्मन / लक्ष्मणवर्मन को विष्णु की प्रतिमा प्राप्त हुई, जो देवपाल के पिता को काँगड़ा नरेश साही से प्राप्त हुई थी। साही ने यह मूर्ति भोज या तिब्बत के राजा से प्राप्त की थी। इस प्रतिमा की स्थापना के लिए यशोवर्मन ने खजुराहो में भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो वर्तमान में चतुर्भुज मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

  • यशोवर्मन का पुत्र व उत्तराधिकारी धंग (954-1002 ई) चंदेल वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा था। उसने अपने पिता से प्राप्त राज्य का और अधिक विस्तार किया। उसने प्रतिहार राजाओं की अधीनता से मुक्ति प्राप्त कर उनके पूर्वी राज्य पर अधिकार कर लिया था। उसने पाल शासकों के अधीन बनारस पर अधिकार कर लिया था तथा आंध्र, कुन्तल, कोसल के राजाओं से भी युद्ध किया था। 954 ई. के खजुराहो शिलालेख के अनुसार, उसने कालिंजर से मालव नदी (बेतवा ) तक, मालव नदी से कालिंदी नदी (यमुना), कालिंदी नदी से चेदि राज्य की सीमाओं और गोपाद्रि पर्वत तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था।
  • राजा धंग ने सुबुक्तगीन के विरुद्ध जयपाल को सहायता भेजी थी। धंग ने 100 वर्ष से अधिक आयु के पश्चात् स्वेच्छा से गंगा-यमुना के संगम में समाधि लेकर प्राण त्याग दिए थे। धंग ने ललित कलाओं और विद्वानों को संरक्षण दिया तथा अपने शासनकाल में खजुराहो में अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया। धंग के शासनकाल में खजुराहो के दो श्रेष्ठतम मंदिरों पार्श्वनाथ और विश्वनाथ का निर्माण हुआ था। इसके पश्चात् राजा गण्ड (1002-1019 ई.) चन्देल वंश का सुयोग्य उत्तराधिकारी हुआ। गण्ड ने आनन्दपाल शाही को महमूद गजनवी के विरुद्ध सहायता प्रदान की थी। गण्ड ने अपने शासनकाल के समय खजुराहो में जगदम्बी नामक वैष्णव मंदिर तथा चित्रगुप्त नामक सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • राजा गण्ड के पुत्र विद्याधर (1019-1027 ई.) के शासनकाल में चंदेलों की शक्ति अपने चरम पर पहुँच गई थी। विद्याधर ने कन्नौज के राजा राजपाल की हत्या उसी के सामंत अर्जुन द्वारा करवा दी थी।
  • इसी कारण 1019 ई. में महमूद ने आक्रमण कर दिया और कालिंजर किले को घेर लिया। विद्याधर ने कूटनीति से काम लेते हुए महमूद से संधि कर ली थी। महमूद गजनवी ने विद्याधर को 15 किले पुरस्कार में दिए तथा वह कुछ संपत्ति लेकर वापस चला गया।
  • विद्याधर ने खजुराहो के कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण कराया था। विद्याधर के पश्चात् विजयपाल एवं देववर्मन सत्तासीन हुए। कलचुरि नरेश लक्ष्मीकर्ण ने देववर्मन को पराजित किया था, परन्तु देववर्मन पश्चात् सत्तासीन हुए कीर्तिवर्मन चंदेल (1060-1100 ई.) ने लक्ष्मीकर्ण पर विजय प्राप्त की।
  • कीर्तिवर्मन के शासन काल के कुछ सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। उसने अपने योग्य सामंत गोपाल की सहायता से अपने राजवंश की खोई शक्ति को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। इसके बाद सुलक्षण वर्मन (1100-1115 ई.), जयवर्मन (1115-1120 ई.) एवं पृथ्वी वर्मन (1120-1129 ई.) सिंहासनारूढ़ हुए।
  • पृथ्वी वर्मन के पश्चात् उसका पुत्र मदनवर्मन (1129-1163 ई.) गद्दी पर बैठा। साहित्यिक प्रमाण शिलालेखों एवं प्राप्त सिक्कों से ज्ञात होता है कि उसके शासनकाल में चंदेल पुनः एक राजनीतिक शक्ति बन गए थे। मालवा में विदिशा के समीप चंदेलों के पुनः आधिपत्य की पुष्टि विदिशा अभिलेख से होती है। इसमें यह उल्लेख है कि मदनवर्मन राहुल शर्मा नामक ब्राह्मण को 10 हल भूमि दान में दी थी। रीवा जिले के त्योंथर तहसील के पनवार ग्राम में मदनवर्मन द्वारा जारी चाँदी के 48 सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि उसके शासनकाल में कैमूर पर्वत श्रेणी के उत्तर तक बघेलखण्ड पर चंदेलों का अधिकार था। मदनवर्मन के पश्चात् उसका पुत्र परमार्दिदेव (1166-1202 ई.) सत्तासीन हुआ जो अंतिम योग्य चंदेल शासक था।
  • परमार्दिदेव ने प्रारम्भिक 16 वर्षो तक अर्थात् 1182 ई. तक शांतिपूर्ण शासन किया। 1182 ई. में दिल्ली के चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान ने जेजाकभुक्ति पर आक्रमण किया। परमार्दिदेव के वीर सेनापति आल्हा और उदल ने इस युद्ध में अत्यधिक शौर्य का प्रदर्शन किया, किन्तु पृथ्वीराज चौहान की विजय हुई थी।
  • 1191-92 ई. में जब पृथ्वीराज मोहम्मद गोरी से युद्ध व्यस्त था, तब परमार्दिदेव ने अपने खोए हुए प्रदेशों पर पुनः अधिकार कर लिया। इसके बाद 1202 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने शम्सुद्दीन अल्तमश (इल्तुतमिश) एवं साहिब किरानी के साथ कालिंजर पर आक्रमण किया। तब परमार्दिदेव ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। कुतुबुद्दीन ऐबक के सामने परमार्दिदेव के कायरतापूर्ण व्यवहार से रुष्ट होकर उसके मंत्रियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गई।
  • परमार्दिदेव के पुत्र त्रैलोक्यवर्मन (1206-1250 ई.) ने मुस्लिम आक्रमणों का प्रतिरोध करते हुए कालिंजर सहित अपना पूरा साम्राज्य वापस ले लिया।
  • गर्रापट्ट के अनुसार, त्रैलोक्यवर्मन ने वर्तमान छतरपुर, पन्ना तथा सागर जिलों में स्थित स्थानों की भूमि दान में दी थी। वीरसेन के अजयगढ़ शिलालेख तथा तबकात-ए-नासिरी से भी इसकी पुष्टि होती है। रीवा के घुरेटीपट्ट के अनुसार, त्रैलोक्यवर्मन ने कलचुरियों को पराजित कर 1212 ई. के आस-पास रीवा के समीप स्थित क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था।
त्रैलोक्यवर्मन का पुत्र वीरवर्मन (1250-1286 ई.) उसका उत्तराधिकारी था। वीरवर्मन का उत्तराधिकारी भोगवर्मन था, जिसने अजयगढ़ के समीपस्थ क्षेत्रों में राज्य किया। चंदेलवंश का अंतिम ज्ञात शासक हम्मीरवर्मन (1288-1330 ई.) था।
चरखारी शिलालेख में हम्मीरवर्मन को कालिंजराधिपति कहा गया है। अजयगढ़ के सती शिलालेख में उसे शासक बताया गया है। 13वीं शताब्दी के अन्त में अलाउद्दीन खिलजी ने इस वंश के शासन को समाप्त कर दिया।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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