बुंदेला वंश (मध्य प्रदेश)
इस लेख में बुंदेला वंश की स्थापना, प्रमुख शासकों, ओरछा राजवंश, मुगलों से संबंध, गढ़कुंडार शासन, तथा पन्ना और दतिया राज्यों की जानकारी दी गई है। साथ ही, 13वीं से 19वीं सदी तक बुंदेला राजाओं द्वारा किए गए युद्ध, निर्माण कार्य, और सत्ता परिवर्तन का वर्णन किया गया है।
बुंदेला शासक सोहनपान ने खंगारों को पराजित कर बुंदेला राज्य की स्थापना की। वीर बुन्देला ने 13वीं सदी में मऊ-माहोनी (उत्तर प्रदेश) में अपनी नवीन राजधानी बसा कर बुन्देलखण्ड में अपना राज्य स्थापित किया था। उसके बाद अर्जुनपाल ने मऊ-माहोनी के आस-पास के क्षेत्रों पर अपना अधिपत्य स्थापित किया।
1231 ई. में अर्जुनपाल के निधन के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र वीरपाल बुन्देलखण्ड की तत्कालीन राजधानी मऊ-माहोनी का शासक बना। इस वंश के अन्य उत्तराधिकारी सहजेन्द्र, नानकदेव पृथ्वीराज रामचन्द्र, मेदनीमल, अर्जुनदेव और मलखान सिंह बुन्देला हुए गढ़कुंडार किले से अपना शासन करते थे।
1501 ई. में रूद्र प्रताप सिंह बुंदेला ने ओरछा राजवंश की नींव रखी। इस वंश में चंपतराय व छत्रसाल प्रतापी राजा हुए। छत्रसाल को महाबली तथा बुंदेल केसरी के नाम से जाना जाता था तथा इन्होंने पन्ना राजवंश की स्थापना की थी।
- मलखान सिंह की मृत्यु के पश्चात् 1531 ई. में रुद्रप्रताप बुन्देला गद्दी पर बैठा और उसने ओरछा को अपनी राजधानी बनाया। उसके उत्तराधिकारी भारतीचन्द्र (1539-1554 ई.) ने ओरछा का दुर्ग, परकोटा, राजाराम मंदिर, शहर दीनपनाह आदि का निर्माण करवाया था।
- 1554 ई. में मधुकरशाह बुन्देला ओरछा का शासक बना। उनके शासनकाल के दौरान अकबर ने सादिक खाँ के नेतृत्व में ओरछा पर आक्रमण करवाया, जिसमें मधुकरशाह ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। इसी युद्ध में मधुकरशाह के पुत्र हारेल देव की मृत्यु हो गयी।
- 1592 ई. में मधुकरशाह की मृत्यु के बाद रामशाह बुन्देला को ओरछा का शासक तथा वीरसिंह देव को दतिया के उत्तर-पश्चिम में स्थित बड़ौनी की जागीर प्रदान की गई। वीरसिंह बुंदेला ने 1602 ई. सलीम (जहाँगीर) के कहने पर सराय बरार में अकबर के विशिष्ट मंत्री अबुलफजल का वध कर दिया था।
- 1627 ई. में वीरसिंह बुन्देला का ज्येष्ठ पुत्र जुझार सिंह ओरछा का शासक बना। 1635 ई. में उसकी हत्या के पश्चात् देवी सिंह बुन्देला ओरछा की गद्दी पर बैठा, किन्तु 1641 ई. में शाहजहाँ ने पहाड़सिंह को ओरछा का शासक नियुक्ति कर दिया।
पहाड़सिंह के पश्चात् सुजानसिंह बुन्देला (1652-72 ई.), इन्द्रमणि बुन्देला (1672-1675 ई.), यशवंत सिंह (1675-1684 ई.), भगत सिंह (1684-1689 ई.), उदोत सिंह (1689-1736 ई.) आदि ओरछा के शासक हुए।
इस वंश में विक्रमादित्य सिंह बुन्देला (1776-1817 ई.) एक पराक्रमी शासक हुए, जिन्होंने बल्देवगढ़ के किले का निर्माण करवाया, किन्तु मराठों की शक्ति से भयभीत होकर 1783 ई. में उन्होंने अपनी राजधानी ओरछा से टेहर (टीकमगढ़) स्थानांतरित कर ली।
2. मध्य प्रदेश का इतिहास
- पुरापाषाण काल
- मध्यपाषाण काल
- नवपाषाण काल
- ताम्रपाषाण काल
- मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति
- ऐतिहासिक काल (लौह युग)
- वैदिक सभ्यता
- पौराणिक कालखण्ड
- महाजनपद काल
- मौर्य काल
- शुंग वंश
- सातवाहन वंश
- हिन्द-यवन
- शक वंश
- कुषाण वंश
- नागवंश
- आभीर वंश
- बोधि और मघ
- वाकाटक वंश
- गुप्त वंश
- औलिकर वंश
- परिव्राजक और उच्चकल्प
- पाण्डु वंश
- परवर्ती गुप्त एवं मौखरि वंश
- कलचुरि राजवंश
- चंदेल
- राष्ट्रकूट
- गुर्जर-प्रतिहार वंश
- मालवा का परमार वंश
- दिल्ली सल्तनत
- मालवा में स्वतंत्र मुस्लिम सल्तनत की स्थापना
- निमाड़ में फारूकी शासन
- मुगल काल
- गढ़ा का गोंड वंश
- तोमर वंश
- बुंदेला वंश
- बघेलखण्ड राज्य
- मध्य प्रदेश में आधुनिक काल का इतिहास
- होल्कर रियासत
- सिंधिया वंश
- भोपाल रियासत
- भोपाल की बेगमें
- मध्य प्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रमुख विद्रोह
- मध्य प्रदेश में 1857 की क्रांति
- राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में मध्य प्रदेश की भूमिका
- झण्डा सत्याग्रह
- जंगल सत्याग्रह
- मध्य प्रदेश में नमक सत्याग्रह
- चरणपादुका नरसंहार
- पंजाब मेल हत्याकांड
- सोहाबल का नरसंहार
- स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अन्य गतिविधियाँ
- भोपाल राज्य का स्वतंत्रता संघर्ष
- भोपाल का जलियाँवाला काण्ड
- रीवा का चावल आंदोलन
Post a Comment