बघेलखण्ड राज्य (मध्य प्रदेश)

बघेलखण्ड राज्य (मध्य प्रदेश)

इस लेख में बघेलखण्ड राज्य की स्थापना, शासकों का शासनकाल, उनकी उपलब्धियाँ, मुगलों से संबंध, राजधानी का स्थानांतरण, युद्ध, सांस्कृतिक योगदान तथा ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन किया गया है। यह लेख बघेल वंश के उत्थान, पतन और शासन की महत्वपूर्ण घटनाओं को संक्षेप में प्रस्तुत करता है।
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1236 ई. में बघेल राज्य की स्थापना गुजरात से आये दो बघेल भाई बीसलदेव और भीमलदेव ने की थी। बाद में बीसलदेव अन्हिलवाड़ा चला गया जहाँ पर वह अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् उनके स्थान पर 1238 ई. में अन्हिलवाड़ के सोलंकी राजा भीमदेव द्वितीय (1778-1241 ई.) का प्रधानमंत्री बन गया।
  • भीमलदेव के पुत्र अनिकदेव (रानिंगदेव) ने गोहरा जागीर का विस्तार कर उसे एक छोटे राज्य का रूप प्रदान किया था। नानिंगदेव का पुत्र बालनदेव उसका उत्तराधिकारी बना। बालनदेव के पुत्र बल्लारदेव (1353-1389 ई.) ने महाराजाधिराज की पदवीं धारण की थी।
  • बल्लारदेव के पुत्र सिंहदेव ने त्रिवेणी (प्रयाग) में जल समाधि ले ली थी। बल्लारदेव का पौत्र वीरमदेव उसका उत्तराधिकारी (1389-1438 ई.) बना, जो अपने पितामह से भी अधिक शौर्यवान एवं महत्वाकांक्षी था। उस समय बघेलखण्ड और कालपी की विभाजक रेखा केन नदी थी।
  • वीरमदेव के पश्चात् उसका पुत्र नरहरिदेव (1438-1470 ई.) हुआ, जिसने 1443 ई. में महमूद शर्की (1441-57 ई.) को कालपी अभियान में सहयोग प्रदान किया था।
  • 15वीं शताब्दी में मुगलों के आगमन के समय गहोरा की राजगद्दी पर वीरसिंहदेव बघेल (1500-1535 ई.) आसीन था। 1539-40 ई. में बघेल राजा वीरभानु ने शेरशाह सूरी के विरुद्ध हुमायूँ की सहायता की थी। 1555 ई. में वीरभानु की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र रामचन्द्र देव बघेल राज्य का शासक (1555-1592 ई.) बना। उसने अपनी राजधानी बांधवगढ़ स्थानान्तरित कर दी। वह अकबर का समकालीन था।
  • संगीत सम्राट तानसेन राजा रामचन्द्र देव के दरबारी गायक थे, जिनकी ख्याति सुनकर अकबर ने 1562 ई. में जलाल खाँ कोर्ची को राजा रामचन्द्र देव के पास भेजकर तानसेन को अपने दरबार में बुलवा लिया था। 1569 ई. में कालिंजर दुर्ग प्राप्त करने के लिए अकबर ने अपनी सेना बांधवगढ़ भेजी थी। फरवरी, 1584 ई. में रामचन्द्र देव और अकबर की भेंट फतेहपुर सीकरी में हुई थी।
1592 ई. में रामचन्द्र देव की मृत्यु के पश्चात् अकबर ने उसके पुत्र वीरभद्रदेव को राजा की पदवी देकर बांधवगढ़ का शासक नियुक्त किया। वीरभद्रदेव की मृत्यु के उपरान्त उसका अल्पवयस्क पुत्र विक्रमाजीत बांधवगढ़ की गद्दी पर बैठा। 1594 ई. में अकबर ने विक्रमादित्य को पदच्युत कर त्रिपुरदास को बांधवगढ़ का सूबेदार बनाया, जिसने 1601 ई. तक मुगलों के अधीन बांधवगढ़ राज्य पर शासन किया।
  • 1602 ई. में अकबर ने वीरभद्र के दासीपुत्र जिर्जीधन (दुर्योधन) को बांधवगढ़ की राजगद्दी पर बैठाया, जिसने 1605 ई. तक शासन किया। 1619 ई. में जहाँगीर ने बांधवगढ़ का क्षेत्र वीरभद्र देव के पुत्र विक्रमाजीत को दे दिया। 1642 ई. में विक्रमाजीत की मृत्यु हो गयी। उसके पश्चात् अमरसिंह (1624-40 ई.) गद्दी पर बैठा, जो मुगलों से अच्छे सम्बंध चाहता था। जहाँगीर ने उसे राजा की पदवी प्रदान की थी। उसके पश्चात् 1640 ई. में अनूपसिंह (1640-60 ई.) गद्दी पर बैठा। अनूपसिंह ने राजपूताना में बूँदी के हाड़ा, उदयपुर के सिसोदिया तथा अजमेर के कछवाह घरानों से वैवाहिक सम्बंध स्थापित किये। इनके समय में पहाड़सिंह बुन्देला ने बघेलखण्ड पर आक्रमण किया था।
इस काल में बांधवगढ़ किला नष्ट हो गया था और रीवा बघेलखण्ड की नई राजधानी बन गई। अनूपसिंह के बाद भावसिंह (1660-90 ई), अनिरुद्ध सिंह (1690-1700 ई) और अवधूत सिंह (1700-1755 ई.) बघेलखण्ड की गद्दी पर बैठे। बाद के शासक अजीतसिंह (1755-1809 ई.), जयसिंह (1809-33 ई.), विश्वनाथसिंह (1833-54 ई.) तथा रघुराज सिंह (1854-80 ई.) हुए।
रघुराजसिंह के समय में गोविन्दगढ़ महल का निर्माण हुआ था। इस राजवंश के अन्य शासक रुद्रराज सिंह, वेंकट रमन सिंह, गुलाब सिंह, मार्तण्ड सिंह हुए।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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