पुरापाषाण काल (मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश का इतिहास अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध रहा है। यह क्षेत्र प्राचीन मानव सभ्यता की महत्वपूर्ण स्थली रहा है, जिसमें पुरापाषाण काल से संबंधित अनेक प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
इस लेख में हम मध्य प्रदेश के पुरापाषाण कालीन महत्व, स्थल, उपकरण, तथा जीवाश्मों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
पुरापाषाण काल और मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश भारत का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा है। यहाँ पुरापाषाण काल से ही मानव सभ्यता के विकास के साक्ष्य मिलते हैं। पुरातात्विक खोजों से यह सिद्ध होता है कि मध्य प्रदेश दक्षिण और उत्तर भारत के तत्कालीन उपकरणों और विभिन्न गतिविधियों का संगम स्थल रहा था। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले औजार, हथियार और अन्य अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि यहाँ मानव जीवन की शुरुआत बहुत ही प्रारंभिक काल में हो चुकी थी।
नदी घाटियाँ और पुरापाषाण काल
मध्य प्रदेश की प्रमुख नदियाँ - नर्मदा, चंबल, बेतवा, सोनार और सोन आदि - इस क्षेत्र की सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। विशेष रूप से, नर्मदा घाटी को पाषाण कालीन मानव सभ्यता के विकास की मुख्य भूमि माना जाता है।
नर्मदा घाटी से सर्वाधिक पाषाण कालीन स्थल और उपकरण प्राप्त हुए हैं, जो उस समय के मानव जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। यहाँ पर हस्तनिर्मित और प्राकृतिक वस्तुओं को औजार तथा हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता था।
भीमबेटका: विश्व धरोहर स्थल
भीमबेटका गुफाएँ मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित हैं और ये पाषाण कालीन सभ्यता का प्रमुख केंद्र रही हैं। इस स्थल को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। यहाँ की गुफाओं में अनेक शैल चित्र प्राप्त हुए हैं, जो प्राचीन मानव जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं। ये चित्र उस काल के लोगों के शिकार, नृत्य और अन्य सामाजिक गतिविधियों को दर्शाते हैं।
प्रमुख पाषाण कालीन स्थल
मध्य प्रदेश में निम्नलिखित स्थल पुरापाषाण काल से संबंधित हैं:
- भीमबेटका (रायसेन) - शैल चित्रों और गुफाओं के लिए प्रसिद्ध
- आदमगढ़ (होशंगाबाद) - प्राचीन उपकरणों और मानव अवशेषों का स्थल
- जावरा (रतलाम) - पुरापाषाण काल के अवशेषों की खोज
- रायसेन और पचमढ़ी - पाषाण युगीन संस्कृति के प्रमाण
प्राचीन औजार और हथियार
इस काल में मानव जीवन के लिए आवश्यक औजारों का निर्माण किया जाता था। प्रमुख औजारों में निम्नलिखित शामिल थे:
- बिना हत्थे वाली कुल्हाड़ी - पेड़ काटने और शिकार के लिए उपयोग
- हस्तकुठार (हत्थे वाली कुल्हाड़ी) - हथियार और औजार दोनों के रूप में उपयोग
- खुरचनी - चमड़ा साफ करने और अन्य दैनिक कार्यों के लिए
- मुष्ठिवुठार - पत्थर से निर्मित हथियार, जो शिकार के लिए उपयोग किया जाता था
नर्मदा घाटी के उत्तर में देवरी, सुखचाईनाला, बुरधाना, केन घाटी, बरखुस, संग्रामपुर और दमोह जिले से इन औजारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा, अमरकंटक से होशंगाबाद जिले तक विस्तृत नर्मदा घाटी में स्तनधारी पशुओं के जीवाश्म भी मिले हैं, जो यहाँ के पर्यावरण और वन्यजीवन के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं।
पुरातात्विक खोज और नर्मदा मानव
पुरातत्वविद डॉ. अरुण सोनकिया ने 5 दिसंबर 1982 को सीहोर जिले के हथनौरा नामक स्थल के उत्खनन के दौरान मानव जीवाश्म (मानव खोपड़ी) के साक्ष्य प्राप्त किए, जिसे "नर्मदा मानव" कहा जाता है। यह अब तक भारत में प्राप्त सबसे प्राचीन मानव अवशेषों में से एक है।
- इसके अलावा, डॉ. एच. डी. सांकलिया और सुपेकर को महादेव पिपरिया (होशंगाबाद) से 860 औजार मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में एक प्रमुख मानव बस्ती रहा होगा। जबलपुर के भेड़ाघाट के समीप जल प्रक्रिया द्वारा वेल्लित पर्त (फ्लेक) के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहाँ पर पत्थर को तराशने की प्रक्रिया अपनाई जाती थी। इसके अतिरिक्त, नरसिंहपुर के निकट भुतरा नामक स्थान से प्राप्त पाषाण कालीन उपकरण मध्य प्रदेश के सबसे प्राचीन उपकरण माने जाते हैं।
मध्य प्रदेश का पुरापाषाण कालीन इतिहास अत्यंत समृद्ध है। यहाँ प्राप्त अवशेष और पुरातात्विक खोजें यह दर्शाती हैं कि यह क्षेत्र भारत की प्राचीनतम मानव सभ्यताओं में से एक का केंद्र था। नर्मदा घाटी और भीमबेटका जैसी जगहों से प्राप्त उपकरण, हथियार और शैल चित्र इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि इस क्षेत्र में मानव जीवन हजारों वर्ष पूर्व से ही विकसित था। आधुनिक पुरातात्विक अध्ययन इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को और अधिक स्पष्ट करने में सहायक हो सकते हैं।
2. मध्य प्रदेश का इतिहास
- पुरापाषाण काल
- मध्यपाषाण काल
- नवपाषाण काल
- ताम्रपाषाण काल
- मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति
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